सभी प्रदेशो का एक सांस्कृतिक एवं भाषाई पहचान है , परन्तु झारखण्ड की स्थिति बड़ी विचित्र है , झारखण्ड में भाषा की बिडम्बना ये है की झारखण्ड की राजभासा हिंदी का झारखण्ड से कोई ऐतिहासिक सम्बन्ध नहीं है न ही कोई सांस्कृतिक सम्बन्ध है . हिंदी एक नयी भासा है . हिंदी के अनेक रूप है खड़ी बोली ,अवधी,ब्रजभासा ,किन्तु भारत सरकार ने पच्छिम उत्तर प्रदेश में बोली जाने वाली खड़ी हिंदी को राष्ट्र भासा माना. खड़ी हिंदी का दो रूप है एक संस्कृत निष्ठ हिंदी और उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी . हम लोग बोल चल में उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी हिंदी का प्रयोग करते है . भारत में स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राजकीय संरक्षण मिला जिससे हिंदी का दुसरे प्रान्तों में फेलाव और विकाश हुआ . किसी भी भासा के विकाश के लिए राजकीय संरक्षण बहुत जरुरी है बिना राजकीय संरक्षण के भय्ये मर या लुप्त हो जाती है जैसा की मैथिलि भासा के साथ हुआ ,ये ३००० बरस पुरानी भासा सरकारी उपेछा के कारण लुप्तप्राय हो गयी है . मैथिलि भासा बांग्ला भासा की जन्मदाता भासा है . बांग्ला भासा की लिपि वास्तव में मिथिलाक्षर है जिसे तिरहुता भी कहते है .
बिहार सरकार में मैथिलि भासा की उपेछा कर के उर्दू को बिहार की द्वितीय राजभासा बना दिया , झारखण्ड में भी बांग्ला भासा की उपेछा कर उर्दू को द्वितीय राजभासा बना दिया . उर्दू का झारखण्ड से क्या सम्बन्ध है , क्या कोई सांस्कृतिक या ऐतिहासिक सम्बन्ध है ,नहीं बिलकुल नहीं , भला अरबी फारसी और तुर्की सब्दो वाली उर्दू भासा का झारखण्ड से क्या सम्बन्ध हो सकता है . झारखण्ड की राजकीय भासा हिंदी खुद एक आयातित भासा है जिसे उत्तर प्रदेश से आयात किया गया है
आज हिंदी झारखण्ड की राजभासा है परन्तु झारखण्ड में हिंदी भासा का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है. हिंदी भासा का आगमन झारखण्ड में १०० बरस पूर्व हुआ . आज भी झारखण्ड के दुर-दराज ग्रामीण अँचल में लोग हिंदी भासा बोलना नहीं जानते . झारखण्ड की पुरानी पीड़ी के लोग हिंदी बोलना नहीं जानते . आजकल दूरदर्सन हिंदी फिल्मो ,केबल टीवी ,रेडिओ की वजह से लोग हिंदी बोलना सीख गए है . युवा पीड़ी हिंदी में बात करना पसंद करती है
परन्तु झारखंडी लोगो की मात्रभासा हिंदी नहीं है. सरकारी कम काज के लिए झारखंडी भाषाये उपयुक्त नहीं है इसलिए हिंदी को राजभासा बनाया गया . झारखण्ड में रह रहे १ करोड़ बिहारी लोग हिंदी बोलते है इसलिए हिंदी को राजभासा बनाया गया .
झारखण्ड में बंगला भासा का इतिहास और झारखंडी संस्कृति पर बंगला भासा का प्रभाव -
बंगला भासा करीब २००० बरस पुरानी भासा है . हिंदी अपेछाकृत नयी भासा हिंदी भासा का विकाश पछिम उत्तर प्रदेश प्रदेश की खरी बोली से हुआ तथा अवधि ब्रज इसके अंग है .
मैथिलि बंगला की जन्मदाता भासा है . बंगला वास्तव में मैथिलि और अंगिका भासा का पूर्वी रूपांतरण है. अंगिका और मैथिलि के साथ बंगला का घनिष्ट सम्बन्ध है .बंगला भासा की लिपि वास्तव में मैथिलि लिपि से ली गयी है जिसे तिरहुता या मिथिलाखर कहते है . बंगला की खुद की कोई लिपि नहीं है .बंगला तिरहुता या मिथिला लिपि को प्रोयोग में लाता है. बंगला भासा का इतिहास झारखण्ड में १०००० बरस पुराना है या उससे भी पुराना .प्राचीन काल
झारखण्ड में बंगाल के पाल वंश का सासन था . सन १९१२ तक झारखण्ड बंगाल प्रसिदेंसी का भाग था.
झारखण्ड के बंगला भासी प्रदेश -
१. संथाल परगना -दुमका ,पाकुर ,जम्तारा ,साहिबगंज ,देवघर
२. मानभूम जिले का झारखण्ड में पड़ने वाले प्रदेश -चास ,चंदनकियारी ,धनबाद जिला ,रांची जिला का सिल्ली ,तमार, सराइकेला ,खरसावाँ का चांडिल ,इचागढ ,नीमदिह अंचल , पूर्वी सिंघ्भुम जिला ,
मानभूम जिला का विभाजन १९५६ -
१ नवम्बर १९५६ को मानभूम जिला का विभाजन बंगाल और बिहार के बीच में हुआ . वास्तव में पूरा का पूरा मानभूम जिला बंगाल में जाना चाहिए था परन्तु केवल ४०% हिस्सा बंगाल को मिला तथा ६०% प्रतिसत हिस्सा बिहार को मिला . मानभूम के बंग्लाभासी इलाके जबरजस्ती बिहार में मिला दिए गए .चास चन्दनक्यारी,चांडिल ,निरसा ,गोविंदपुर अदि बंग्लाभासी इलाके बिहार में मिला दिए गए . पछिम बंगाल सरकार ने मानभूम में रुचि नहीं दिखाई या ठीक से प्रयास नहीं किया जबकि बिहार सरकार ने पूरी तत्परता दिखाए जिससे मानभूम का ६०% हिस्सा बिहार को मिला और केवल ४०% बंगाल को जो पुरुलिया जिला के नाम से जाना जाता है.
मानभूम के झारखंडी लोग खोरठा भाषा का खोरठा भाषियों द्वारा प्रोयोग का अवलोकन और तुलनात्मक , विश्लेसनात्मक अध्यन -
जैसा मैंने देखा बोकारो धनबाद चास चंदनकियारी अदि क्षेत्र में खोरठा बोलने वालो का खोरठा भासा के प्रोयोग के सन्दर्भ में अपने मित्रो , अपने खोरठा भाषी पारिवारिक सम्बन्धी कार्यक्षेत्र आदि में मेरे द्वारा किया गया अवलोकन और उसका बंगला और हिंदी भासा के साथ तुलनात्मक अध्यन .
खोरठा भाषा की उत्पत्ति - मघही+नागपुरी +बंगला =खोरठा भाषा और बर्तमान साहित्य रचना में बंगला की जगह हिंदी प्रमुख हो गया है .खोरठा भाषी क्षेत्रो में हिंदी का आगमन केवल १०० बरस पहेले हुआ उससे पहले इन इलाको में संथाल परगना मानभूम धनबाद आदि में बंगला भाषा का ही बर्चस्वा था . खोरठा केवल गाव देहात की बोलचाल की भाषा है तथा इसका प्रोयोग सीमीत क्षेत्रो में ही हो सकता है . प्रश्न है की बोकारो धनबाद संथाल परगना में १९४७ से पहेले हिंदी कितनी मात्र में प्रचलित थी . सच्चाई ये है की उन दिनों चास चंदनकियारी धनबाद बोकारो के इलाको के ग्रामीण क्षेत्रो में हिंदी बोलना कोई नहीं जानते थे जबकि बंगला बोलना जानते थे बंगला संथाल परगना मानभूम सिंघ्भुम में १०००-१२०० बरस पूर्व से प्रचलित है . हिंदी का प्रोयोग आज़ादी के बाद में जब हिंदी को रास्त्रभाषा घोषित किया तो हिंदी उत्तर प्रदेश मध्यप्रदेश की सीमा से निकल कर सरकारी सहायता से पुरे भारत बर्ष में फेले और कुछ ही बरसों में एक सर्व भारतीय भाषा बन गयी लेकिन हिंदी का इन इलाको कोई इतिहास नहीं रहा है .
प्रश्न ये है की १९४७ या १९३० या और उससे पहेले यहाँ के लोग पढाई लिखी , जमीं जायदाद के कामकाज, जमींदारी के कम , धार्मिक चर्चा , धार्मिक कथा कर्मकांड सभी की भाषा बंगला ही थी क्योकि पुस्तके केवल बंगला भाषा में ही मिलती थी और छपती थी .यहाँ तक की सभी स्कूल में बंगला ही पढाई लिखी का माध्यम था खाश कर जब कोल्कता ब्रिटिश राज की राजधानी हुआ करती थी तब बंगला ही सरकारी कामकाज की भाषा थी . खोरठा भाषा के विकाश कल में हिंदी इस भोगोलिक परिदृश्य से गायब थी और झारखण्ड में उसका प्रवेश नहीं हुआ था .खोरठा भाषा के विकाश के समय बंगला इस क्षेत्र की विकशित भाषा थी इसलिए खोरठा के विकाश में बंगला का बहुत ज्यादा योगदान रहा है .खोरठा जनमानस के धार्मिक क्रिकलाप पर तो बंगला का पूरा प्रभाव रहा है . धार्मिक कीर्तन ,कितिवाशी बंगला रामायण का पथ ,होरी बोल , खोरठा भाषी क्षेत्र में वैश्नव
परमपरा ने बंगला चर्च्या को बल दिया .उस समय भूमि अभिलेख खतियान संथाल परगना धनबाद मानभूम सिंघ्भुम में बंगला भाषा में ही होते थे इससे एन इलाको में बंगला भाषा की प्राचीनता की पता चलता है
खोरठा साहित्य रचना का वर्त्तमान परिदिस्य -
खोरठा के वर्त्तमान साहित्यकारों ने खोरठा का हिंदी रूपांतरण कर दिया . खोरठा साहित्य पूरी तरह से हिंदी पर आश्रित हो गया . देवनागरी लिपि को अपनाया गया क्योंकि खोरठा की अपनी कोई लिपि नहीं है . सब्द भंडार भी सीमीत है इसलिए हिंदी सब्दावाली को अपना लिया गया है .
खोरठा का हिंदी से कोई इतिहासिक सम्बन्ध नहीं है वैसे भी हिंदी भाषा अपने आधुनिक रूप में केवल २०० बरस पूर्व प्रकट हुआ है और १०० बरस पूर्व उसका झारखण्ड में प्रवेश हुआ है . लेकिन खोरठा साहित्यकारों ने उसे हिंदी की उपभाषा बना दिया है . खोरठा साहित्य में वोह ठेठ पन नहीं है ऐसा प्रतीत होता है की पहले हिंदी में लिखकर उसे खोरठा में रूपांतरित किया गया हो. बोलचाल में भी खोरठा भाषी हिंदी पर पूरी तरह आश्रित है . केवल पानुरीजी की रचना में वोह खालिश मिटटी की सुगंध मिलती है .जिन सब्दो के लिए खोरठा सब्दावाली मौजूद है उनके लिए भी जबरजस्ती हिंदी सब्दो का प्रोयोक किया जाता है क्योकि लोग परिश्रम नहीं करना चाहते है और खोरठा के तेथ सटीक सब्दो को खोजना नहीं चहेते या तो हिंदी सब्दो का प्रोयोग करते है या हिंदी सब्दो को जबरजस्ती खोरठा सब्द बनाने की कोशिश करते . खोजने पर बहुत्सरे सब्दो का खोरठा सब्दावाली मिल जाएगी . हिंदी भाषा पर इतना ज्यादा आश्रित होना खोरठा के मूल स्वरुप को ख़तम कर देगा .
बोलचाल में खोरठा का प्रोयोग-
आज खोता केवल गाव देहात की भाषा बन गयी है (गाव देहात में भी लोग यदा कदा हिंदी बोलते है )
सहरो में रहने वाले खोरठा भाषी हिंदी बोलना पसंद करते है या तक की बोकारो धनबाद में रहने वाले खोरठा भाषी अपने घर में भी हिंदी बोलना पसंद करते है .झारखण्ड के सहरो में जैसे बोकारो धनबाद रांची में खोरठा नहीं भोजपुरी बोली जाती वास्तव में बोकारो में इतनी ज्यादा भोजपुरी बोली जाती है की ये सहर भोजपुरी प्रदेश प्रतीत होता . जहा खोरठा भाषी हर जगह हिंदी बोलते है वोही बिहार से आ कर बसने वाले भोजपुरी लोग हर जगह भोजपुरी ही बोलते है और उनकी संख्या भी ज्यादाहै नगरो में रहने वाला खोरठा भाषी पढ़ा लिखा अभिजात्य वर्ग और बोकारो धनबाद में राणे वाले उनके संतान हिंदी भाषा का ही पयोग करते है यहाँ तक की अपने घर में भी . झारखंडी अपने घर में ही अल्पसंख्यक बन गए है और धनबाद बोकारो बिहार के उपनिवेश बन गए है . खोरठा भाषी नयी पीढ़ी के लड़के लडकिय खुद को इस तरह से पेश करते है की वोह तो पीढियों से हिंदी बोल रहे . जबकि उनके घर की कोई वृधा दादी नानी हिंदी बोलना नहीं जानती है . हमें ये स्वीकार करना होगा की हिंदी इस क्षेत्र के लिए नयी भाषा है .
खोरठा भाषी हिंदी पर पूरी तरह आश्रित है जिसे उनके व्यवहार में वोह खलिश झारखंडीपण नहीं रहा .
कारन -
१. खोरठा हिंदी और बंगला की तुलना में तकनिकी रूप से कमजोर भाषा है .सबध बंधार की कमी , तकनिकी सब्दावाली की कमी के कारन हिंदी के सामने टिक नहीं पति और हिंदी के सामने आत्मा समर्पण कर देती है .
२. खोरठा भाषी क्षेत्र में बाहरी लोगो का वर्चास्वा , इस क्षेत्र में अर- छपरा के लोगो वर्चास्वा है और उन लोगो ने यहाँ के लोगो को बुरी तरह से दबा दिया है .
३. बोल चल में पढ़े लिखे लोग खोरठा बोलना नहीं चाहते है क्योकि सब्द भंडार कम होने के कारन तुरंत हिंदी की सरण में आना पड़ता है .
भासा का सकती सतुलन -
झारखण्ड में भाषा के दो ध्रुब है एक हिंदी और दूसरा बंगला .
पन्च्पर्गानिया खोरठा नागपुरी , केवल बोली मात्र है . इनका कोई स्वतंरा अस्तित्वा नहीं है . हिंदी और बंगला जैसी सक्तिशाली भासवो के सामने ये टिक नहीं पायेगी .बंगला का जब भी तुलना होगातो तमिल हिंदी जैसे विकशित भाषावो से होगा भोजपुरी खोरठा जैसे क्षेत्रीय बोलिवो से नहीं . मैथिलि एक अपवाद है क्योकि मैथिलि एक क्षेत्रीय बोली के साथ साथ एक पूर्ण भाषा भी है जिसका ३००० बरस पुराना इतिहास है लिखित साहित्य व्याकरण और खुद की लिपि भी है लेकिन बिहार सरकार की उपेछा से लुप्त प्राय है क्योकि बिहार सरकार ने मैथिलि की उपेछा कर के उर्दू को बिहार की राजभाषा बना दिया . क्या उर्दू को बिहार की राजभाषा बनाना उचित था .मैथिलि बंगला की जन्मदाता भाषा है बंगला की लिपि वास्तव में मिथिलाक्षर ही है .
हिंदी भाषा का साम्राज्यवाद -
झारखण्ड में हिंदी का एकाधिकार है . बंगला को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने से भाषा का सकती संतुलन बनेगा .
भाषा के विकाश के लिए राजकीय संरक्षण जरूरी है . हिंदी भासा को रास्त्रभाषा का दर्जा मिलने से हिंदी का विकाश हुआ और पुरे भारत में फैली. हिंदी भाषा का विकाश पश्चिम उत्तर प्रदेश की खरी बोली से हुआ .मुग़ल कल के फारसी राजभाषा थी और बाद में फारसी के अधर पर उर्दू का विकाश हुआ . उर्दू का विकाश कल १५ वी १६ वी और १७वि सताब्दी रहा है . १७ वी सदी उर्दू अपने आधुनिक रूप में प्रकट हुई ये केवल मुसलमानों के उच्च वर्ग की भाषा थी .खाश तोर पर जो भारतीय मुस्लमान
तुर्की ईरानी अरबी अफगान वंसज थे या मुसलमानों के अभिजय वर्ग के भाषा थी . ये गाव देहात में रहने वाले हिन्दू से धर्मान्तरित मुसलमानों की भाषा नहीं थी . मुसलमानों का ९०% हिन्दू से धर्मान्तरित मुसलमानों का था और वोह स्थानीय देसज भाषाए ही बोलती थी . बाद में मुस्लिम राष्ट्रवाद के फेलाव के चलते बाकि मुस्लमान भी उर्दू के प्रभाव में आ गए .लेकिन १८ वी सताब्दी तक ये केवल शहरी अभिजात्य उच्च वर्गीय सेख सय्यद मुग़ल पठान मुसलमानों की भाषा ही बनी रही . उत्तर भारत के ग्रामीण मुसलमानों पर उर्दू का बिलकुल भी प्रभाव नहीं पड़ा था .गाव में रहने वाले अंसारी और जुलाहे भाषा के मामले पूरी तरह से भोजपुरी अवधी बुन्देलखंडी,खड़ी बोली , ब्रजभाषा पर आधारित थे . बाद में ब्रिटिश राज में अंग्रोजो ने उर्दू बहुत बढावा दिया .ब्रिटिश राज में मुस्लिम राष्ट्रवादियो ने उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया .
हिंदी और उर्दू का विवाद बढता चला गया जिसकी परिणिति देश के विभाजन के रूप में आई .
कांग्रेस और गाँधी जी ने बीच का रास्ता हिन्दुस्तानी भाषा के रूप में सुझाया . हिन्दुस्तानी हिंदी और उर्दू की मिश्रित भाषा थी . गाँधी जी ने सुझाव दिया की देवनागरी लिपि को अपनाया जाय और उर्दू सब्दो को स्वीकार किया जाय और हिन्दू और उर्दू के मिश्रित रूप हिन्दुस्तानी की ही अभिभाजित भारत की रास्त्र भाषा बनाया जाय . परन्तु मुस्लिम लीग उर्दू को रास्त्रभाषा बनाने पर अड़ी रही जिसका परिणाम देश का भिभाजन के रूप आया और उर्दू को पाकिस्तान की रास्त्रभाषा बनाया गया है .
भारत में भी उर्दू - जम्मू कश्मीर , झारखण्ड दिल्ली आंध्र वेस्ट बंगाल , बिहार उत्तर प्रदेश में राजकीय भाषाहै उर्दू भाषा का मुद्दा मुस्लिम वोट बैंक पोलिटिक्स से जुड़े गयी है . हर राजनितिक दल उर्दू के विकाश की बात करता है . कांग्रेस तो तुस्टीकरण की राजनीती करती ही है अन्य दल भी अपने राज्यों में उर्दू मीडियम स्कूल खोल रहे है और उर्दू को बढावा दे रहे है . भारत के हर राज्य में मुसल्माओ के लिए अलग मदरसा बोर्ड है .हैदराबाद में रास्ट्रीय उर्दू विश्वविदालय बनायीं गयी है .
मुसलमानों द्वारा हिंदी भाषा का बहिस्कार -
भारत में एक सामानांतर शिक्षा व्यवस्था चल रही है . उत्तर प्रदेश बिहार झारखण्ड , मद्यप्रदेश ,आदि राज्यों में हिंदी मीडियम स्कूल के बगल में उर्दू मीडियम स्कूल चल रहे है .क्या उत्तर भारत के मुसलमान हिंदी पड़ना लिखना नहीं जानते है ? तो फिर से अलग उर्दू मीडियम स्कूल की जरुरत क्यों पढ़ी क्या ये मुस्लमान की अलगावादी सोच का प्रतिक नहीं है?
क्या धरम बदलने से भाषा भी बदल जाती है ?झारखण्ड में मुसलमानों का उर्दू से क्या सम्बन्ध है ?झारखंडी के मुस्लमान झारखंडी मूल्निवाशी सदान है तथा आदिवाशी संथाल कुड्मी तेली कुम्हार मुंडा और अन्य झारखंडी जातयो के धर्मान्तरित होने से बने है . और उनका उर्दू भाषी उत्तर प्रदेश के मुसल्माओ से कोई सम्बन्ध नहीं रहा है . झारखंडी मुस्लमान ठेठ झारखंडी रहे रहे और झारखंडी भासये खोरठा , पंचापर्गानिया , नागपुरी , कुड्माली और झारखंडी मोटा बंगला बोलते रहे है .
भला अरबी , फारसी और तुर्की सब्दो से बनी उर्दू का भला झाढ़ंद से क्या सम्बन्ध हो सकता है ?
फ्रीर क्यों उर्दू को झारखंडी की द्वितीय राजभाषा बनाया गया , क्या उर्दू एक झारखंडी भाषा है या उर्दू का झारखण्ड से कोई सांस्कृतिक या इतिहासिक सम्बन्ध है ? नहीं बिलकुल नहीं उर्दू का झारखण्ड से कोई सम्बन्ध नहीं है .
अलीगढ मुस्लिम विश्वविदालय और भारत का भिभाजन -
अलीगढ मुस्लिम विश्वविदालय भारत के भिजन के लिए उत्तर दाई है क्योकि भारत विभाजन का बीज वोही पर बोया गया था .AMU का एक घृणित सांप्रदायिक इतिहास रहा है .
पर कांग्रेस सरकार ५ राज्यों में अलीगढ मुस्लिम विश्वविदालय का ब्रांच खोलने जा रहे है क्या ये साम्प्रदायिकता को बढावा नहीं देगा ?
हिंदी भाषा का विकाश -
हिंदी भाषा का विकाश उर्दू के बाद हुआ है करीब १००-१५० बरस बाद . चूँकि उर्दू को मुस्लमान नबाबो और शासको का राजकीय संरक्षण मिला जबकि हिंदी अपने प्रयाश से विकशित हुई . हिंदी का विकाश मुख्या रूप से उत्तर प्रदेश डेल्ही और मध्य प्रदेश में हुआ. हिन्दू सवर्णों ने हिंदी का विकाश .में मुख्या भूमिका निभाई
गंगा यमुना दोआब(उत्तर प्रदेश ) के हिन्दू ब्राहमण , कायस्थ समुदाय के लोग ही हिंदी के प्रारंभिक साहित्यकार रहे है.
उत्तर प्रदेश के हिन्दू ब्रह्मण और कायस्थों ने हिंदी साहित्य का विकाश किया . संस्कृत को हिंदी के विकाश का आधार बनाया गया . परन्तु हम ये नहीं भूल सकते है की हिंदी की प्रारंभिक काब्य आमिर खुसरो और कवि रहीम द्वारा फारसी लिपि में रचित थे और उन्होंने दिल्ली के आस पास बोली जाने वाली इस भाषा की हिन्दिवी कहा .
झारखण्ड के भासा -
हिंदी झारखण्ड की राजकीय भासा है जो की गैर झारखंडी दिकु भाषा है .हिंदी को उत्तर प्रदेश से आयातित किया गया है . झारखंडी भासये राजकाज के उपयुक्त नहीं होने के कारन एक गैर झारखंडी भाषा हिंदी को झारखंडी की राजभाषा बनाया गया .हिंदी का झारखण्ड में केवल १०० बरस पुराना इतिहास है .
झारखण्ड की द्वितीय राजभासा -
झारखण्ड की द्वितीय राजभाषा निश्चित रूप से बंगला को बनाया जाना चाहिए नाकि उर्दू को . क्योकि बंगला भाषा का झारखण्ड में १०००-१२०० बरस पुराना इतिहास रहा है .ओडिया भी सराइकेला खरसावाँ सिंघ्भुम की प्राचीन भाषा रही है .
बंगला और ओडिया को निश्चित रूप से झारखण्ड की द्वितीय राजभाषा बनाना चाहिए परन्तु दुर्भाग्य की बात है की सन २००७ में मधु कोड़ा सरकार ने बंगला को छोड़कर उर्दू को द्वितीय राजभाषा बना दिया गया .
झारखण्ड में द्वितीय भाषा के रूप में बंगला का ओडिया का विरोध -
झारखण्ड में कुछ संगठन बंगला और ओडिया जो द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने का विरोध कर रहे है . उनका तर्क है की ये गैर झारखंडी भाषा है . क्या बंगला और ओडिया का विरोध करने वाले झारखंडी संगठन मुझे ये बताने का कष्ट करंगे की क्या उर्दू और हिंदी क्या झारखंडी भाषा है ? अगर नहीं तो फिर आप लोग उसका बिरोध क्यों नहीं करते है ?
बंगला और ओडिया का विरोध करने वाले ये नेता किस मुह से विधानसभा में उर्दू शिक्षक और मदरसा शिक्षको बहाली और मदरसा अनुदान की बात करते है ?कई झारखंडी नेता जो हिंदी (दिकु भाषा ) के लिखे पोस्टर बैनर द्वारा बंगला ओडिया का विरोध कर रहे है वो विधानसभा में उर्दू मीडियम स्कूल खोलने उर्दू शिक्षको की बहाली और मदरसा अनुदान के लिए हंगामा करते है . ऐसे दोगले चरित्र के लोगो को पहचाने की जरुरत है .अपने को झारखंडी भाषा संस्कृति का हितेषी और ठेकेदार बताने वाले लोग पहले उर्दू का विरोध कर के दिखाए .
उर्दू के विषय पर सभी झारखंडी भाषा अखडा और संगठनो ने चुप्पी क्यों साध ली है क्या उर्दू झारखंडी भाषा है ?
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